कब रखते हैं अखंड द्वादशी व्रत?

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सांसारिक दुखों को दूर कर पुण्य और मोक्ष प्राप्ति के लिए हिंदू  शास्त्रों में व्रत, हवन, तीर्थ स्नान व दान- पुण्य आदि का विधान  है, पर कई बार पुण्य कार्यों में कोई कमी रहने पर उसका उल्टा फल मिल जाता है. भविष्य पुराण के अनुसार राज्य पाकर भी जो निर्धन, धनी होकर भी धन का भोग और दान नहीं कर पाना, उत्तम रूप पाकर भी काना, अंधा या लंगड़ा होना, स्त्री पुरुष का वियोग होना जैसे लक्षण धार्मिक कार्यों में कमी का ही परिणाम होता है. ऐसे में इस कमी को दूर करने के लिए पुराणों में अखंड द्वादशी, मनोरथ द्वादशी और तिल द्वादशी व्रतों का विधान बताया गया है.आज हम आपको इनमें से अखंड द्वादशी व्रत की विधि बताने जा रहे हैं. जो मार्गशीर्ष मास की शुक्ल द्वादशी को किया जाता है.

अखंड द्वादशी व्रत की विधि

अखंड द्वादशी के व्रत की विधि भगवान श्रीकृष्ण ने राजा युधिष्ठिर को बताई. उन्होंने बताया कि मार्गशीर्ष मास की द्वादशी के दिन मनुष्य को पंचगव्य मिश्रित जल से स्नान कर भगवान विष्णु की भक्ति भाव से पूजा करनी चाहिए. भगवान नारायण का लगातार स्मरण करते हुए जौ व धान से भरा पात्र ब्राह्मण को दान करना चाहिए.

इस दिन भगवान की प्रार्थना इस प्रकार करनी चाहिए कि भगवन मुझ से सात जन्मों में व्रत करने में कोई भी कमी रह गई हो, वह सब आपके अनुग्रह से पूरी हो जाए. हे पुरुषोत्तम! जिस प्रकार आप से यह सारा जगत परिपूर्ण है, उसी प्रकार मेरे खंडित सभी व्रत पूर्ण हो जाएं

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