कला के सहारे विदेश तक पहुंच रही खंडवा जिले में बांस से बनी चीजों की ख्याति

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खंडवा। मध्य प्रदेश के खंडवा जिले के आदिवासी विकासखंड खालवा की पहचान कुछ समय पहले तक कुपोषण वाले क्षेत्र के रूप में होती थी। बदलाव की बयार कुछ ऐसी चली कि अब यह क्षेत्र देश ही नहीं विदेश में भी अपने हुनर से पहचान बना रहा है। यहां के आदिवासी बांस से सुंदर कलाकृतियां और उपयोगी वस्तुएं बनाकर प्रशंसा तो पा ही रहे हैं, अपने व परिवार का जीवन स्तर भी बेहतर कर रहे हैं। दुबई एक्सपो में गुलाईमाल गांव के बांस शिल्पियों की समृद्ध कला का प्रदर्शन लघु फिल्म के माध्यम से होगा। बदलाव की शुरुआत भारत सरकार के सूक्ष्म, लघु एवं मध्यम उद्यम मंत्रालय की स्फूर्ति योजना से हुई। इसके अंतर्गत मनमोहन कला समिति द्वारा बेंबू (बांस) क्राफ्ट क्लस्टर संचालित किया जा रहा है। इसके पूर्व संसद परिसर में आयोजित प्रदर्शनी में गुलाईमाल के क्लस्टर की चीजों को देशभर के पांच क्लस्टर के साथ आमंत्रित किया जा चुका है।

राखियों और बांस के बाक्स को मिली सराहना

इस क्षेत्र में बांस की कारीगरी देखते ही बनती है। इसी वर्ष 22 जून से शुरू हुए बेंबू क्लस्टर में महिला व पुरुषों को रोजगार उपलब्ध करवाया जा रहा है। पांच दिव्यांग भी बांस की कारीगरी सीख रहे हैं। क्लस्टर संचालक महेश नायक ने बताया कि जून, 2020 में छह-छह लोगों के 21 समूह बनाए गए। 42 मशीनों के माध्यम से बांस से फर्नीचर, घरेलू उपयोग की चीजें जैसे नाइट लैंप, फ्लावर पाट, घड़ी, ज्वेलरी जैसे नेकलेस, ईयर रिंग, ट्रे, मोबाइल स्टैंड, राखी, बेंबू बाक्स, चटाई व अन्य सामग्री बनाई जा रही है। 100 से अधिक आदिवासी परिवारों का जीवन खुशहाल हुआ है। क्लस्टर को कई जगहों से 7000 से ज्यादा राखियों के आर्डर मिले थे। बाक्स को भी सराहना मिलती है।

क्लस्टर के अध्यक्ष मोहन रोकड़े ने बताया कि बांस को उपयोग में लाने से पहले 21 दिन तक फिटकरी व नमक वाले पानी में भिगोकर रखा जाता है। इससे निर्मित चीजों की उम्र ज्यादा होती है और उनमें फफूंद नहीं लगती।

कलस्टर खुलने से रुका पलायन, लौटी खुशहाली

गुलाईमाल में बेंबू कलस्टर शुरू होने से मजदूरी की तलाश में शहरों की ओर होने वाले पलायन में कमी आई है। आधुनिक मशीनें स्थापित होने से कारीगरों की हस्तशिल्प कला पुनर्जीवित होने के साथ ही उन्हें रोजगार भी मिल रहा है। ग्राम ढमारिया के कारीगर जीवन अवासे ने बताया कि पहले रोजगार के लिए जलगांव, भुसावल या पुणे जाता था। इस केंद्र से जुड़कर स्थायी रोजगार मिला है। भारत अवासे और बनू बाई की भी कुछ ऐसी ही कहानी है। बनू बाई भी मजदूरी करने जाती थीं। आज पति नारायण के साथ क्लस्टर में काम कर रही हैं। बच्चों को अच्छी शिक्षा और स्वास्थ्य सुविधाएं उपलब्ध करवा रही हैं।

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