भागीरथपुरा दूषित पानी कांड की न्यायिक जांच रिपोर्ट सार्वजनिक होने के बाद प्रशासनिक और तकनीकी व्यवस्थाओं की कई गंभीर खामियां सामने आई हैं। रिपोर्ट के अनुसार, यह त्रासदी किसी एक घटना या एक अधिकारी की गलती का नतीजा नहीं थी, बल्कि करीब तीन दशक से चली आ रही सीवर और पेयजल व्यवस्था की खामियों, निगरानी की कमी और समय पर कार्रवाई नहीं होने का परिणाम थी।
रिपोर्ट में बताया गया है कि क्षेत्र में दूषित पानी की समस्या और लोगों के बीमार पड़ने की जानकारी 2024 में ही सामने आने लगी थी। इसके बावजूद पाइपलाइन बदलने की प्रक्रिया समय पर पूरी नहीं हो सकी। रिपोर्ट के मुताबिक, पाइपलाइन बदलने का काम मूल रूप से मई 2024 तक पूरा होना था, लेकिन प्रशासनिक और टेंडर प्रक्रिया में देरी के कारण इसे जनवरी 2026 में बदला जा सका।
सीवर और पेयजल लाइन की खामियां बनीं बड़ी वजह
जांच में सामने आया कि कई स्थानों पर सीवर और पेयजल पाइपलाइन निर्धारित तकनीकी मानकों के अनुरूप अलग-अलग दूरी पर नहीं थीं। कुछ जगह दोनों लाइनें समानांतर थीं और कहीं एक-दूसरे को क्रॉस करती मिलीं। इससे लीकेज या पाइपलाइन खराब होने की स्थिति में सीवर का दूषित पानी पेयजल लाइन में पहुंचने का खतरा बना हुआ था।
रिपोर्ट के अनुसार, घटना का तत्काल कारण सीवरेज का दूषित पानी पेयजल वितरण व्यवस्था में पहुंचना था, जबकि इसके पीछे सीवर नेटवर्क की पुरानी प्लानिंग और निर्माण संबंधी खामियों को मूल कारणों में शामिल किया गया है।
36 मौतों ने खड़े किए जवाबदेही के सवाल
भागीरथपुरा में दूषित पानी की घटना के दौरान बड़ी संख्या में लोग बीमार हुए और 36 लोगों की मौत हुई। न्यायिक जांच में कई स्तरों पर जिम्मेदारियों और व्यवस्थागत कमियों का उल्लेख किया गया है। रिपोर्ट ने यह भी स्पष्ट किया कि पूरी घटना को केवल किसी एक अधिकारी की गलती के तौर पर नहीं देखा जा सकता, बल्कि लंबे समय तक चली कई चूकों ने स्थिति को गंभीर बनाया।









