सावन का महीना भगवान शिव की आराधना के साथ पारिवारिक रिश्तों और परंपराओं से भी जुड़ा माना जाता है। धार्मिक मान्यताओं के अनुसार, शादी के बाद बेटी का सावन में मायके आना शुभ माना जाता है। खासकर नवविवाहित बेटियों के लिए पहले सावन में मायके आने की परंपरा कई परिवारों में निभाई जाती है। मान्य
ता है कि इससे बेटी और मायके के बीच स्नेह बढ़ता है और घर में सुख-समृद्धि आती है।
आरती उतारकर क्यों किया जाता है स्वागत?
मान्यता के अनुसार, जब बेटी सावन में मायके आती है तो उसका स्वागत आरती, रोली-अक्षत और मिठाई से किया जाता है। कई जगह बेटी को सावन से जुड़े पकवान खिलाने और श्रृंगार सामग्री या उपहार देने की भी परंपरा है। कुछ परिवार बेटी के हाथों से घर में तुलसी का पौधा लगवाना भी शुभ मानते हैं।
धार्मिक मान्यताओं के साथ इसका एक भावनात्मक पक्ष भी है। शादी के बाद बेटी के मायके आने से परिवार के सदस्यों के बीच अपनापन और रिश्तों की गर्माहट बनी रहती है।
सावन में शादी करना क्यों माना जाता है वर्जित?
हिंदू धार्मिक मान्यताओं में सावन का महीना मुख्य रूप से भगवान शिव की उपासना और साधना के लिए समर्पित माना जाता है। इसी अवधि में चातुर्मास भी रहता है, जिसे मांगलिक कार्यों के लिए अनुकूल नहीं माना जाता। इसलिए कई परंपराओं में सावन के दौरान विवाह और अन्य बड़े मांगलिक संस्कार नहीं किए जाते।
मान्यता है कि चातुर्मास के दौरान भगवान विष्णु योगनिद्रा में रहते हैं और देवशयन के कारण विवाह जैसे मांगलिक कार्यों पर विराम रहता है। हालांकि, विवाह की तिथियां और शुभ मुहूर्त क्षेत्र, पंचांग और परंपरा के अनुसार अलग-अलग हो सकते हैं।
बेटी के लिए सावन का खास महत्व
सावन में मायके आने की परंपरा केवल धार्मिक मान्यता तक सीमित नहीं है। यह बेटी को अपने माता-पिता और परिवार के साथ समय बिताने का अवसर भी देती है। हरियाली तीज जैसे पर्वों पर भी विवाहित महिलाओं के मायके जाने और परिवार के साथ त्योहार मनाने की परंपरा कई क्षेत्रों में प्रचलित है।
इस तरह सावन में बेटी का मायके आना जहां धार्मिक रूप से शुभ माना जाता है, वहीं यह परिवार और बेटी के बीच भावनात्मक जुड़ाव को मजबूत करने वाली सदियों पुरानी परंपरा भी है।










