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पीएम मोदी के भोपाल दौरे के बीच सीएम शिवराज का कांग्रेस पर वार, कहा- ‘आजादी की लड़ाई को एक परिवार का इतिहास बना दिया’

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नेशनल देशभर में 15 नवम्बर यानि आज के दिन को स्वतंत्रता सेनानी भगवान बिरसा मुंडा की जयंती जयंती के रूप में मनाया जाता हैं। इस अवसर पर उन्हें याद करने और श्रद्धांजलि देने के लिए देशभर में कार्यक्रम आयोजित किए जा रहे है जिसके तहत पीएम नरेंद्र मोदी भी भोपाल में जनजातीय गौरव दिवस के अवसर पर मध्यप्रदेश सरकार द्वारा आयोजित किये आ रहे कार्यक्रम में शामिल होने आ रहे हैं .इस मौके मध्य प्रदेश के मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान ने कांग्रेस पर निशाना साधा है। उन्होंने आरोप लगाया है कि कांग्रेस और अंग्रेजों ने देश को गलत इतिहास पढ़ाया है।

सीएम शिवराज सिंह चौहान ने कहा के- ‘मैं भगवान बिरसा मुंडा की जयंती को जनजातीय गौरव दिवस के रूप में मनाने के निर्णय के लिए प्रधानमंत्री मोदी को धन्यवाद देता हूं। ये हमारे आदिवासी योद्धाओं की वीरता को प्रदर्शित करने के लिए सही चीज है। अंग्रेजों और कांग्रेस ने हमेशा इतिहास को गलत ढंग से पढ़ाया। स्वतंत्रता संग्राम के इतिहास को एक परिवार की पीढ़ी का इतिहास बना दिया।’

मध्यप्रदेश में हमने जनजातीय भाई-बहनों के कल्याण के लिए जो कई योजनाएं बनाई हैं,प्रधानमंत्री श्री नरेंद्र मोदी जी उनका आज शुभारंभ करेंगे।

हबीबगंज रेलवे स्टेशन का नाम उन्होंने रानी कमलापति के नाम पर रखा है। यह रानी कमलापति के साथ भोपाल व म.प्र. का भी सम्मान है।

नहीं छोड़ते शिवराज कोई भी मौका

दरअसल कुछ समय से सीएम शिवराज सिंह चौहान कांग्रेस पार्टी और विशेषकर पूर्व मुख्यमंत्री कमलनाथ पर निशाना साधने में कोई कसर नहीं छोड़ते और पूर्व मुख्यमंत्री कमलनाथ भी उनपर आरोप लगाने में देर नहीं लगाते. आरोप-प्रत्यारोप का यह सिलसिला इन दो नेताओ के बीच बहुत समय से देखने मिल रहा है. अब यह देखना दिलचस्प होगा के मप्र कांग्रेस मुख्यमंत्री शिवराज के इस आरोप का क्या जवाब देती है .

हबीबगंज नहीं अब रानी कमलापति रेलवे स्टेशन कहिए, जानिए- कौन थीं रानी कमलापति

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भोपाल। देश का पहला वर्ल्ड क्लास रेलवे स्टेशन हबीबगंज अब रानी कमलापति के नाम से जाना जाएगा। मध्यप्रदेश सरकार के नोटिफिकेशन जारी होते ही स्टेशन का नाम बदल दिया गया है।  हबीबगंज स्टेशन का नाम रानी कमलापति किए जाने के बाद रेलवे ने नया कोड भी जारी कर दिया है। पश्चिम-मध्य रेलवे ने आदेश जारी कर नया अल्फा कोड RKMP दिया है। अभी तक हबीबगंज का कोड HBJ था। फिलहाल हबीबगंज स्टेशन के प्लेटफॉर्म नंबर 1 के आउटर और प्लेटफॉर्म नंबर एक पर ही यह नाम बदला गया है। अन्य प्लेटफार्म और सेकंड एंट्री पर अभी कोई बदलाव नहीं हुआ है। बाहर भी रानी कमलापति रेलवे स्टेशन नाम का बैनर लगा दिया है। साथ ही, हबीबगंज नाम को कपड़े से ढंक दिया गया है। मप्र के मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान ने माइक्रोब्लॉगिंग प्लेटफॉर्म Koo पर पोस्ट कर कहा कि  ये गर्व, आनंद व उत्साह का क्षण है कि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी जी ने विश्वस्तरीय सुविधाओं से युक्त रेलवे स्टेशन तैयार करवाया और अब इसका नाम हबीबगंज से बदलकर अंतिम हिंदू रानी गोंड वंश की रानी कमलापति जी के नाम किया। हम सभी प्रधानमंत्री जी का हृदय से धन्यवाद करते हैं।   ये गर्व, आनंद व उत्साह का क्षण है कि यशस्वी प्रधानमंत्री श्री नरेंद्र मोदी जी ने विश्वस्तरीय सुविधाओं से युक्त रेलवे स्टेशन तैयार करवाया और अब इसका नाम हबीबगंज से बदलकर अंतिम हिंदू रानी गोंड वंश की रानी कमलापति जी के नाम किया। हम सभी प्रधानमंत्री जी का हृदय से धन्यवाद करते हैं।  जानें- कौन हैं रानी कमलापति…

इतिहास पर गौर करें, तो रानी कमलापति भोपाल की अंतिम गोंड आदिवासी और हिंदू रानी थीं। अपनी आबरू की रक्षा के लिए उन्होंने जल समाधि ले ली थी। भोपाल में आर्च ब्रिज और कमला पार्क उन्हीं के नाम पर है। गोंड समुदाय का राजवंश गिन्नौरगढ़ से बाड़ी तक फैला था। राजा रायसिंह का वर्ष 1362 से 1419 तक 57 वर्ष का कार्यकाल रहा। रायसिंह ने रायसेन किला बनवाया था। 14वीं ईस्वी में जगदीशपुर (इस्लाम नगर) में गोंड राजाओं का आधिपत्य रहा। इस महल को भी गोंड राजाओं द्वारा बनवाया गया था।

 

बचपन से ही बुद्धिमान और साहसी थीं कमलापति

बता दें कि16वीं ईस्वी में चैन सिंह बाड़ी जिला रायसेन के अंतिम शासक रहे। 16वीं सदी में सीहोर जिले की सलकनपुर रियासत के राजा कृपाल सिंह सरौतिया थे।  उनके यहां एक कन्या का जन्म हुआ। उसकी सुंदरता को देखते हुए उसका नाम कमलापति रखा गया। वह बचपन से ही बुद्धिमान और साहसी थीं। शिक्षा, घुड़सवारी, मलयुद्ध और तीर कमान चलाने में उन्हें महारत हासिल थी। अनेक कलाओं से पारंगत राजकुमारी सेनापति भी रहीं। वह पिता के सैन्य बल और महिला साथी दल के साथ युद्ध में शत्रुओं से लोहा लेती थीं। पड़ोसी राज्य अकसर खेत, खलिहान, धन संपत्ति लूटने के लिए आक्रमण किया करते थे। सलकनपुर रियासत की देखरेख करने की जिम्मेदारी राजा कृपाल सिंह सरौतिया और उनकी बेटी राजकुमारी कमलापति पर थी।

राजा निजाम शाह से हुआ था विवाह

भोपाल से 55 किमी दूर 750 गांवों को मिलाकार गिन्नौरगढ़ राज्य बनाया गया जो देहलावाड़ी के पास आता है। इसके राजा सूराज सिंह शाह (सलाम) थे। इनके पुत्र निजाम शाह थे। निजाम शाह बहादुर, निडर और हर कार्यक्षेत्र में निपुण थे। उन्हीं से रानी कमलापति का विवाह हुआ था। राजा निजाम शाह ने रानी कमलापति को प्रेम स्वरूप 1700 ईस्वी में भोपाल में सात मंजिला महल का निर्माण करवाया, जो लखौरी ईंट और मिट्टी से बनवाया गया था। यह महल अपनी भव्यता, सुंदरता और खूबसूरती के लिए प्रसिद्ध था। रानी कमलापति का वैवाहिक जीवन काफी खुशहाल व्यतीत हो रहा था। उन्हें एक पुत्र की प्राप्ति हुई, जिसका नाम नवल शाह था।   रानी कमलापति की बुद्धिमत्ता,साहस और अद्वितीय शासकीय गुणों से हम सभी परिचित हैं। उन्होंने जल समाधि लेकर नारी सम्मान के साथ-साथ धर्म और संस्कृति की भी रक्षा की।

भोपाल रियासत का गौरव ’गोंड रानी कमलापतिःभोपाल की अन्तिम हिन्दू रानी’ के विषय में मेरे विचार…रिश्तेदार ने जहर देकर निजाम शाह को मार दिया था

सलकनपुर राज्य में बाड़ी किले के जमींदार का लड़का चैन सिंह राजकुमारी कमलापति की शादी होने के बाद भी उनसे विवाह करने की इच्छा रखता था। उसने कई बार राजा निजाम शाह को मारने की कोशिश की, जिसमें वह असफल रहा। एक दिन प्रेम पूर्वक उसने राजा निजाम शाह को भोजन पर आमंत्रित किया और भोजन में जहर देकर हत्या कर दी। राजा निजाम शाह की मौत की खबर ने पूरे गिन्नौरगढ़ में खलबली पैदा कर दी। इसके बाद रानी कमलापति को अकेले जानकर उन्हें पाने की नीयत से गिन्नौरगढ़ के किले पर उसने हमला कर दिया। रानी कमलापति ने उस समय अपने कुछ वफादारों और 12 वर्षीय बेटे नवल शाह के साथ भोपाल में बने इस महल में छिप जाने का निर्णय लिया। यह उस समय सुरक्षा की दृष्टि से काफी महत्वपूर्ण महल था।

बदला लेने के लिए रानी ने ली थी अफगानियों की मदद

कुछ दिन भोपाल में समय बिताने के बाद रानी कमलापति को पता चला कि भोपाल की सीमा के पास कुछ अफगानी आकर रुके हुए हैं। इन्होंने जगदीशपुर (इस्लाम नगर) पर आक्रमण कर उसे अपने कब्जे में ले लिया था। इन अफगानों का सरदार दोस्त मोहम्मद खान था, जो पैसा लेकर युद्ध लड़ते थे। लोक मान्यता है कि रानी कमलापति ने दोस्त मोहम्मद को एक लाख मुहरें देकर चैन सिंह पर हमला करने को कहा था।

दोस्त मोहम्मद ने की थी चैन सिंह की हत्या

दोस्त मोहम्मद ने गिन्नौरगढ़ के किले पर हमला कर दिया था। जिसमें चैन सिंह मारा गया और किले को हड़प लिया। रानी कमलापति को अपने छोटे बेटे की परवरिश की चिंता थी। उन्होंने दोस्त मोहम्मद के इस कदम पर कोई आपत्ति नहीं जताई, लेकिन दोस्त मोहम्मद अब सम्पूर्ण भोपाल की रियासत पर कब्जा करना चाहता था। उसने रानी कमलापति को अपने हरम में शामिल होने और शादी करने का प्रस्ताव रखा

रानी के बेटे से मोहम्मद के बीच हुआ था युद्ध

दोस्त मोहम्मद खान के नापाक इरादे को देखते हुए रानी कमलापति का 14 वर्षीय बेटा नवल शाह अपने 100 लड़ाकों के साथ लालघाटी में युद्ध करने चला गया। इस घमासान युद्ध में मोहम्मद खान ने नवल शाह को मार दिया। इस स्थान पर इतना खून बहा कि यहां की जमीन लाल हो गई और इस कारण इसे लालघाटी कहा जाने लगा। इस युद्ध में 2 लड़के बच गए थे, जो किसी तरह अपनी जान बचाते हुए मनुआभान की पहाड़ी पर पहुंच गए। उन्होंने वहां काला धुआं कर रानी कमलापति को संकेत दिया कि वे युद्ध हार गए हैं और आपकी जान को खतरा है।

रानी कमलापति ने ली जल समाधि

रानी कमलापति ने विषम परिस्थति को देखते हुए अपनी इज्जत को बचाने के लिए बड़े तालाब बांध का संकरा रास्ता खुलवाया। इससे बड़े तालाब का पानी रिसकर दूसरी तरफ आने लगा। जिसे आज छोटा तालाब के रूप में जाना जाता है। रानी कमलापति ने महल की समस्त धन, दौलत, जेवरात, आभूषण आदि इसमें डालकर स्वयं जलसमाधि ले ली। दोस्त मोहम्मद खान जब अपनी सेना को साथ लेकर लालघाटी से इस किले तक पहुंचा, उतनी देर में सब कुछ खत्म हो गया था। मोहम्मद खान को न रानी कमलापति मिली और न ही धन दौलत। रानी कमलापति ने जीते जी भोपाल पर परधर्मी को नहीं बैठने दिया। स्रोतों के अनुसार रानी कमलापति ने वर्ष 1723 में अपनी जीवनलीला खत्म की थी। उनकी मृत्यु के बाद दोस्त मोहम्मद खान के साथ ही नवाबों का दौर शुरू हुआ

देश भर में लोग बना रहे बाल दिवस

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सोशल मीडिया पर #बेहतरकलबेहतर ज़िंदगी नाम से चल रही मुहिम

 

भारत के प्रथम प्रधानमंत्री पंडित जवाहरलाल नेहरू भारत के सबसे बड़े नेताओ में माने जाते है और उनके जन्म दिन  को देश में बाल दिवस के रूप में बनाया जाता है. कहा जाता है की बच्चों को लेकर उनके मन के बहुत प्रेम था और वे उनमे भारत का भविष्य देखते थे. इसी कारण उनके जन्मदिन को पूरे देश में बाल दिवस के रूप में मनाया जाता है और इस दिन मुख्य तौर पर बच्चों पर केन्द्रित जआयोजन किए जाते है, स्कूल के कार्यक्रमों के लेकर सरकारी आयोजनो तक आज के दिन आयोजित किए जाते है.

 

इसी कडी में सोशल मीडिया भी अछूता नहीं है और सोशल मीडिया ऐप कू कर लोग #बेहतरकलबेहतर_ज़िंदगी नाम से हैश्टैग चला रहे है. इस हैश्टैग के ज़रिए लोग बाल जीवन की महत्वता समझा रहे है और आने वाली पीढ़ियों के लिए एक बेहतर कल की माँग कर रहे है. ****_#बेहतर_कल_बेहतर_ज़िंदगी अगर बच्चों और  देश  का भबिस्य तभी बन  सकता है सभी धर्म जातपात ऊंचनीच त्यागकर मानबता का पाठ सिक्षा क़े साथ पढ़ाना जरूरी है बरना धर्मो के ठेके दार  एक  दूसरे  नफरत पैदा करते रहेगे****_#बेहतर_कल_बेहतर_ज़िंदगी अपना बेहतर कल बनाने आओ सँवारे उनका आज ,खुशहाल जिंदगी का उनकी फिर होगा सुखी आगाज |इसी में ख़ुशी है ,इसी में उसकी बंदगी ,आओ आज बनायें हम बच्चों की जिंदगी |नवाब मलिक की बेटी ने भी किया समर्थन

 

महाराष्ट्र सरकार में मंत्री और रंकपा नेता नवाब मलिक जो आजकल अपने बयानो को लेकर सुर्खियों में रहते है उनकी बेटी नीलोफर खान मलिक जो कि खुद एक सोशल वर्कर है उन्होंने भी इस हैश्टैग को अपना समर्थन दिया और सोशल मीडिया ऐप कू पर अपने विचार रखते हुए  कहा के-

 

प्रिय बच्चों, परिस्थितियाँ कठिन रही हैं, फिर भी आप दृढ़ रहे हैं। माता-पिता के रूप में, हम आशा करते हैं और हर रोज आपकी रक्षा करना चाहते हैं और आपको बाहरी दुनिया के खतरों से बचाना चाहते हैं। नेताओं ने भी किया  याद

 

पंडित जवाहरलाल नेहरू के जनमदिन के अवसर पर सभी राजनैतिक पार्टियों ने उन्हें  याद किया और देश को बाल दिवस की शुभकामनाए दी.

 

उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ ने Koo पर लिखा – देश के उज्ज्वल भविष्य और उन्नति के कर्णधार सभी बच्चों व प्रदेशवासियों को ’बाल दिवस’ की हार्दिक बधाई व शुभकामनाएं।

 

प्रत्येक बच्चे का उन्नयन @UPGovt की शीर्ष प्राथमिकता है।

 

आइए, आज हम सभी बच्चों के सर्वांगीण विकास में सहभागी बनने का प्रण लेकर ’बाल दिवस’ को सार्थकता प्रदान करें। ****देश के उज्ज्वल भविष्य और उन्नति के कर्णधार सभी बच्चों व प्रदेशवासियों को ’बाल दिवस’ की हार्दिक बधाई व शुभकामनाएं।

 

मध्य प्रदेश के मुख्यमंत्री ने कू पर लिखा – सभी बच्चों को बाल दिवस की हार्दिक बधाई। बच्चों तुम देश के कर्णधार हो। शिक्षा व खेल समेत हर क्षेत्र में आगे बढ़ो। अपना लक्ष्य तय कर लो और उसे प्राप्त करने के पथ पर निकल पड़ो। एक सुंदर और सफल भविष्य तुम्हारी प्रतीक्षा कर रहा है।

 

मेरी शुभकामनाएं सदैव तुम्हारे साथ हैं: CM

 

सभी बच्चों को बाल दिवस की हार्दिक बधाई। बच्चों तुम देश के कर्णधार हो। शिक्षा व खेल समेत हर क्षेत्र में आगे बढ़ो। अपना लक्ष्य तय कर लो और उसे प्राप्त करने के पथ पर निकल पड़ो। एक सुंदर और सफल भविष्य तुम्हारी प्रतीक्षा कर रहा है। मेरी शुभकामनाएं सदैव तुम्हारे साथ हैं

108 वर्ष बाद कनाडा से लाई गई भारत, कौन हैं मां अन्नपूर्णा देवी, क्या है उनका काशी से नाता?

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नई दिल्ली। लगभग सौ साल पहले काशी से चोरी गई मां अन्नपूर्णा की मूर्ति कनाडा से काशी आई है, जिसकी आज पुनः प्राण प्रतिष्ठा की जा रही है। सीएम योगी आदित्यनाथ मां अन्नपूर्णा की मूर्ति को पुनर्स्थापित करेंगे। मां को बाबा विश्वनाथ के गर्भगृह के ठीक बगल में विराजमान किया जाएगा। विधिविधान से काशी विश्वनाथ मंदिर के ईशान कोण में प्रतिमा की प्राण प्रतिष्ठा होगी।

हरिप्रबोधिनी एकादशी पर सोमवार को कनाडा से लाई गई अन्नपूर्णेश्वरी की मूर्ति समेत पांच विग्रह स्थापित किए जाएंगे।

पीएम मोदी ने दी थी जानकारी

बता दें कि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने 29 नवंबर 2020 को मन की बात कार्यक्रम में देश के लोगों को मां अन्नपूर्णा की प्रतिमा कनाडा में मिलने की जानकारी देते हुए कहा था कि हर एक भारतीय को यह जानकर गर्व होगा कि मां अन्नपूर्णा की सदियों पुरानी प्रतिमा कनाडा से भारत वापस लाई जा रही है। यह करीब 108 साल पहले वाराणसी के एक मंदिर से चोरी हुई थी। बनारस शैली में उकेरी गई 18वीं सदी की यह मूर्ति कनाडा की यूनिवर्सिटी आफ रेजिना में मैकेंजी आर्ट गैलरी की शोभा बढ़ा रही थी। इस आर्ट गैलरी को 1936 में वकील नार्मन मैकेंजी की वसीयत के अनुसार तैयार किया गया था।

जानें- कैसी है मां अन्नपूर्णा की मूर्ति

कनाडा से वापस आई इस प्रतिमा में मां अन्नपूर्णा के एक हाथ में खीर की कटोरी और दूसरे हाथ में चम्मच है। माना जा रहा है 18वीं शताब्दी की ये प्रतिमा 1913 में काशी के एक घाट से चुरा ली गई थी, और फिर इसे कनाडा ले जाया गया। प्राचीन प्रतिमा कनाडा कैसे पहुंची, यह राज आज भी बरकरार है। लोगों का कहना है कि दुर्लभ और ऐतिहासिक सामग्रियों की तस्करी करने वालों ने प्रतिमा को कनाडा ले जाकर बेच दिया था। वहां यह मैकेंजी आर्ट गैलरी में रेजिना विश्वविद्यालय के संग्रह का हिस्सा थी। इस मूर्ति की वसीयत 1936 में नॉर्मन मैकेंज़ी द्वारा करवाई गई थी और गैलरी के संग्रह में जोड़ा गया था। जी किशन रेड्डी के मुताबिक 2014 के बाद से अब तक प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के कार्यकाल में 42 दुर्लभ धरोहरों की देश वापसी हो चुकी है, जबकि 1976 से 2013 तक कुल 13 दुर्लभ धरोहर ही वापस लाई जा सकी थीं।  आज देवोत्थान एकादशी के पावन अवसर पर माँ अन्नपूर्णा की दुर्लभ प्रतिमा की प्राण प्रतिष्ठा पुनः श्री काशी विश्वनाथ धाम में होगी।

यह बहुप्रतीक्षित ऐतिहासिक क्षण आदरणीय प्रधानमंत्री जी के प्रयासों का सुफल है।

माँ की कृपा सम्पूर्ण सृष्टि पर बनी रहे। 

जय माँ अन्नपूर्णा!     कौन है मां अन्नपूर्णा देवी? 

स्कंदपुराण के काशीखंड में मां अन्नपूर्णा के बारे में विस्तृत जानकारी मिलती है जिसमें मां के स्वरूप का वर्णन कुछ इस प्रकार से मिलता है- ‘मां अन्नपूर्णा’ का रूप काफी मनमोहक और सुंदर है। वे मां दुर्गा का ही एक रूप हैं, जो कि अपने भक्तों से बहुत प्रेम करती हैं। ‘मां अन्नपूर्णा’ अन्न की देवी हैं, इन्हीं के आशीष से पूरे विश्व में भोजन का संचालन होता है। उन्हें ‘मां शाकुम्भरी’ के नाम से भी जाना जाता है।

काशी से क्या है मां अन्नपूर्णा का नाता?

शास्त्रों के अनुसार मां अन्नपूर्णा ने मां पार्वती के रूप में भगवान शिव से विवाह किया था। शिवजी कैलाश पर्वत के वासी थे। लेकिन हिमालय की पुत्री पार्वती को कैलाश यानी कि अपने मायके में रहना पसंद नहीं आया इसलिए उन्होंने काशी, जो कि भोलेनाथ की नगरी कही जाती है, वहां रहने की इच्छा जाहिर की, जिसके बाद शिवजी उन्हें काशी ले आए। इसलिए काशी ही मां अन्नपूर्णा की नगरी कही जाती है। इसलिए कहा जाता है विश्वनाथ की नगरी में कोई भी भूखा नहीं रहता है। काशी में ही ‘मां अन्नपूर्णा’ का सुंदर मंदिर हैं, जो कि अन्नकूट के दिन खुलता है और यहां उस दिन 56 तरह के भोग लगते हैं।

यूजीसी अध्यक्ष के लिए किस्मत अजमाने में लगे वरिष्ठ शिक्षाविद

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इंदौर । विश्वविद्यालय अनुदान आयोग (यूजीसी) में नए अध्यक्ष को चुनने के लिए प्रक्रिया शुरू हो गई है। इंदौर-भोपाल और ग्वालियर से कई वरिष्ठ शिक्षाविदों व प्राध्यापक दिलचस्पी दिखा रहे हैं। उन्होंने अपना-अपना बायोडाटा भेजा है। वैसे शिक्षा मंत्रालय ने 30 नवंबर तक आवेदन मांगे है, जिसमें आवेदक की उम्र 60 साल से कम की उम्र सीमा रखी है। इसके चलते कुछ आवेदकों के बायोडाटा स्क्रटूनी में ही बाहर हो सकते हैं।

वहीं इन दिनों सर्च कमेटी के सदस्यों का गठन किया जा रहा है। अधिकारियों के मुताबिक उन आवेदकों पर विचार नहीं किया जाएगा, जिनके खिलाफ कोई विभागीय जांच या फिर कोई आपराधिक प्रकरण दर्ज हो। हालांकि वर्तमान अध्यक्ष डा. डीपी सिंह का दिसंबर में कार्यकाल पूरा होने वाला है। डा. सिंह देवी अहिल्या विश्वविद्यालय के पूर्व कुलपति भी रह चुके है। दिसंबर पहले सप्ताह में प्रो. सिंह 65वें साल में प्रवेश करेंगे। इस लिहाज से उनका कार्यकाल पूरा हो जाएगा। उनके पद छोड़ने से पहले शिक्षा मंत्रालय ने यूजीसी के नए अध्यक्ष के चयन की प्रक्रिया शुरू कर दी है।

नियमानुसार कार्यकाल पांच वर्ष का रहेगा। इसके लिए आयु सीमा निर्धारित कर दी। 60 साल से कम उम्र वालों को आवेदन करने पर जोर दिया है, क्योंकि मंत्रालय ने पांच साल का कार्यकाल रखा है। ताकि 65 वर्ष की आयु तक कार्यकाल पूरा हो सके। मंत्रालय ने बायोडाटा की सॉफ्ट कापी ई-मेल से भेजने के लिए निर्देश दिए है। अध्यक्ष के लिए कुछ मानक तय कर रखे है, जिसमें नवचार, कुशल नेतृत्व, शिक्षा व शोध में उत्कृष्ठ कार्य, संस्थान निर्माण में गतिशील, विचार केंद्रीत नेतृत्व आदि शामिल है।

मध्य प्रदेश में बाल कांग्रेस की शुरुआत, इंदौर के लक्ष्य गुप्ता को बनाया स्टेट कैप्टन

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भोपाल। पंडित जवाहरलाल नेहरू की जन्मतिथि 14 नवंबर को प्रदेश में बाल कांग्रेस का गठन किया गया। प्रदेश कांग्रेस अध्यक्ष कमल नाथ ने प्रदेश कांग्रेस कार्यालय में आयोजित कार्यक्रम में इसकी औपचारिक शुरुआत की। उन्होंने कहा कि नौजवान देश और प्रदेश का भविष्य है पर इससे खिलवाड़ किया जा रहा है। इतिहास को तोड़मरोड़ करके प्रस्तुत किया जा रहा है। इसके लिए भाजपा के पास इंटरनेट मीडिया की बड़ी मशीनरी है। इसका जवाब बाल कांग्रेस देगी। हम नहीं कहते कि आप कांग्रेस का साथ दीजिए पर सच्चाई को पहचानिए और उसका साथ जरूर दीजिए। आज देश के पहले प्रधानमंत्री पंडित जवाहरलाल नेहरू को नीचा दिखाने का काम हो रहा है। स्वर्गीय इंदिरा गांधी की भूमिका पर सवाल उठाए जा रहे हैं। कार्यक्रम में संगठन का पहला स्टेट कैप्टन इंदौर के लक्ष्य गुप्ता को घोषित किया गया।

प्रदेश कांग्रेस अध्यक्ष ने कहा कि मध्य प्रदेश का भविष्य तभी सुरक्षित रह सकता है, जब आप इतिहास को समझें और जानें। देश के इतिहास में कई सरकार आईं और गईं पर किसी ने ऐसा दुष्प्रचार नहीं किया। कांग्रेस और देश की संस्कृति जोड़ने की है। विश्व में ऐसे कोई देश नहीं है, जहां इतने धर्म, जाति, भाषा, रस्म और त्योहार हों। हम एक झंडे के नीचे खड़े हैं, यही भारत की संस्कृति है। आज इस पर हमला हो रहा है। आपको बहकाने का प्रयास किया जा रहा है। जवाहरलाल नेहरू के सामने देश को एक रखने और नवनिर्माण की चुनौती थी। जो लोग आज हमें राष्ट्रवाद का पाठ पढ़ाने आए हैं, आप उनसे पूछिए कि एक स्वतंत्रता संग्राम सेनानी का नाम बता दें, जो उनकी पार्टी के हों।

 

इंदिरा गांधी ने गरीबी हटाओ का नारा दिया था। कृषि क्षेत्र में क्रांति लाने का काम हो या फिर पाकिस्तान को सबक सिखाकर बांग्लादेश बनाने का काम हो, उन्होंने ही किया था। यह कोई सर्जिकल स्ट्राइक का नाटक नहीं था बल्कि एक लाख सैनिकों ने आत्मसमर्पण किया था। वर्ष 2019 के चुनाव में प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने 15 लाख रुपये खाते में जमा करने और दो करोड़ नौजवानों को रोजगार देने का वादा किया था पर क्या हुआ। उन्होने कहा कि बाल कांग्रेस मध्य प्रदेश ही नहीं देश में उदाहरण बनेगी।

सिद्धू ने चुनाव से पहले किया ऐलान-कौन सी सीट से चुनाव लड़ेंगे

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चंडीगढ़
हर समय पार्टी लाइन से अलग सुर अपनाकर चर्चा में बने रहने वाले कांग्रेस नेता नवजोत सिंह सिद्धू ने साफ कर दिया है कि वह आगामी पंजाब विधानसभा चुनाव में अमृतसर सीट से ही चुनाव लड़ेंगे। इससे पहले कुछ अटकलें थीं कि सिद्धू पटियाला से भी चुनाव लड़ सकते हैं। सिद्धू मूल रूप से पटियाला से ही हैं। वहीं, सिद्धू ने यह भी ऐलान किया कि पार्टी चीफ सोनिया गांधी को भेजे 13 सूत्रीय एजेंडा पर अब चन्नी सरकार ने काम करना शुरू कर दिया है।

हालांकि जब सिद्धू से 2022 विधानसभा चुनाव में सीएम चेहरे को लेकर सवाल किया गया तो उन्होंने इसे टाल दिया। सिद्धू से पूछा गया कि क्या आगामी पंजाब चुनाव में वह सीएम पद का चेहरा हो सकते हैं। इस पर सिद्धू ने जवाब दिया कि यह पार्टी हाईकमान तय करेगा। इसके बाद सिद्धू बोले कि वह अपनी जबान के पक्के हैं और सिर्फ अमृतसर से ही चुनाव लड़ेंगे।

सिद्धू ने कहा, ‘मैंने तब भी अपना चुनावी क्षेत्र नहीं बदला था जब अरुण जेटली को साल 2014 के चुनाव में अमृतसर से टिकट दी गई थी। मैंने राज्यसभा की सीट तक लेने से इनकार कर दिया था।’ बता दें कि कांग्रेस से पहले सिद्धू बीजेपी में थे और साल 2004 से अमृतसर सीट से सांसद रहे थे। सिद्धू ने साल 2017 में कांग्रेस जॉइन की थी और चुनाव में वह अमृसर ईस्ट सीट से जीतकर विधायक बने थे। इस सीट पर सिद्धू से पहले उनकी पत्नी नवजोत कौर विधायक थीं।

बीते महीने ही नवजोत सिद्धू ने पार्टी अध्यक्ष सोनिया गांधई को चिट्ठी लिखकर पंजाब सरकार को 13 मुद्दों पर काम करने के लिए निर्देश दिए जाने को कहा था। बता दें कि सिद्धू को कांग्रेस ने इसी साल जुलाई में पंजाब कांग्रेस अध्यक्ष बनाया था और उन्होंने सितंबर में इस पद से इस्तीफा देकर सबको हैरान कर दिया था। हालांकि, बाद में सिद्धू ने यह इस्तीफा वापस ले लिया।

मानव सभ्यता की विकास यात्रा की सहभागिता रही हैं म.प्र. की जनजातीय भाषाएँ

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भोपाल: किसी भी मानव-समुदाय की पृथक पहचान उसकी जीवन-शैली, सांस्कृतिक परंपराओं और भाषा-बोली से होती है। आज स्थिति यह है कि वैश्वीकरण की प्रक्रिया में दुनिया की सैकड़ों बोलियाँ विलुप्त होने की कगार पर हैं। किसी भी सभ्यता के विकास में भाषा की प्रमुख भूमिका होती है। मनुष्य अपने भाव अथवा विचार भाषा के माध्यम से ही अन्य व्यक्ति तक सम्प्रेषित करता है। इस प्रकार भाषा मनुष्य को सामाजिक प्राणी बनाने में केन्द्रीय तत्व के रूप में कार्य करती है। जनजाति समुदायों की भाषाओं पर विचार करते हुए यह तथ्य और अधिक महत्वपूर्ण हो जाता है। ये भाषाएँ मानव-सभ्यता की विकास-यात्रा में सहयात्री रही हैं, इसलिये इनमें आरंभिक मनुष्य द्वारा अन्वेषित और अर्जित पारंपरिक ज्ञान संचित है,जो अत्यंत मूल्यवान है।

    जनजातीय भाषाओं का एक-एक शब्द संबंधित समुदाय की सांस्कृतिक निधि है। इन भाषाओं की परंपरागत वाचिक (मौखिक) संपदा के माध्यम से ही मानव-इतिहास, सभ्यता-संस्कृति, वनस्पति और जीव-जगत, कृषि, वास्तु एवं अन्य कला-कौशलों संबंधित ज्ञान की परंपरा को समझा जा सकता है। भारत की सांस्कृतिक विविधता में भाषिक भिन्नता एक प्रमुख घटक है। राष्ट्र की इस वैविध्यपूर्ण विशेषता को अक्षुण्ण रखने के लिए विभिन्न भाषा-बोलियों को बचाए रखना आवश्यक है। यह निश्चित है कि भाषाओं को बचाने का काम उसे बोलने वाले  ही कर सकेंगे।

      जनजातीय भाषाओं को जब तक आजीविका से नहीं जोड़ा जायेगा,तब तक संबंधित समुदाय भी इन्हें आर्थिक भविष्य के लिये अनुपयोगी और अवरोध मानकर उनकी उपेक्षा ही करेंगे। अन्य उन्नत भाषाओं और सभ्यताओं से सघन संपर्क के कारण जनजातीय भाषाओं के स्वरूप में बदलाव आ रहा है। भाषा की यह परिवर्तनशीलता एक स्वाभाविक प्रक्रिया है। इसे चाहकर भी रोका नहीं जा सकता।

      मध्यप्रदेश में 43 अनुसूचित जनजातियाँ अथवा उनके समूह हैं।पहले प्रत्येक जनजाति समुदाय की अलग भाषा हुआ करती थी। अब केवल भीली, भिलाली, बारेली, पटलिया, गोंडी, ओझियानी, अगरिया, बैगानी, कोरकू, मवासी, नहाली ही कुछ क्षेत्रों में परिवर्तित रूपों के साथ संबंधित समुदायों की प्राय: पुरानी पीढ़ी द्वारा बोली जाती हैं। अन्य जनजातियों की बोलियाँ लुप्त हो चुकी हैं, जैसे-कोल की कोलिहारी, परधान की परधानी, भारिया की भरियाटी, सहरिया की सहरानी, खैरवार या कोंदर की खैरवारी तथा भिम्मा, नगारची, मोंगिया सहित अन्य जनजातियों की भाषाएँ भी।

   भारत की मान्य भाषाएँ वे हैं, जो आठवीं अनुसूची में सम्मिलित हैं।तकनीकी रूप से ये प्रायः वे भाषाएँ हैं, जिनके प्रयोक्ताओं की संख्या तुलनात्मक दृष्टि से अधिक है और जिनका समृद्ध साहित्यिक इतिहास है। इनके अलावा भी देश में अनेक भाषाएँ हैं,जिनका प्रयोग व्यापक क्षेत्र में होता है और जिनमें प्रचुर मात्रा में साहित्य भी उपलब्ध है। वर्ष 1961 की जनगणना में कुल 1652 मातृभाषाएँ चिन्हित की गयीं थीं, जिनमें से 184 भाषाओं को बोलने वालों की संख्या 10 हजार से अधिक थी। ‘पीपुल ऑफ इंडिया’ के अनुसार भारत में 75 प्रमुख भाषाएँ हैं, जबकि मातृभाषा के रूप में 325 बोलियों का प्रयोग होता है। ‘एथनोलॉग’ में उल्लेख किया गया है कि भारत में कुल 398 भाषाएँ रही हैं, जिनमें से 387 जीवित हैं और 11 मृत हो चुकी हैं। एक आकलन के अनुसार 32 भाषाएँ ऐसी हैं, जिनका प्रयोग 10 लाख अथवा उससे अधिक लोग करते हैं। यूनेस्को की मान्यता पर ध्यान दें तो भारत में 400 भाषाएँ हैं, जिनमें से 70 से 80 प्रतिशत विलोपन के क्षेत्र में हैं।

आयुक्त भाषाई अल्पसंख्यक द्वारा वर्ष 2005 में प्रस्तुत ‘लघु भाषाएँ : विशेष प्रतिवेदन’ में उल्लेखानुसार भारत में कुल 116 भाषाएँ हैं, जिनमें से 22 आठवीं अनुसूची में तथा 94 उसके बाहर हैं। इनके अलावा दस हजार से कम प्रयोक्ताओं वाली अनेक बोलियाँ हैं, जिनमें से 44 सुपरिभाषित हैं। इसी प्रतिवेदन में बताया गया है कि चार अण्डमानीय भाषाएँ- अका 50, जारवा 300, सैंटिनलीज़ 100 तथा ओंजे 100 भाषा-भाषियों के साथ जीवित हैं।

       मध्यप्रदेश जनजातीय जनंसख्या की दृष्टि से भारत का सबसे बड़ा राज्य है।जैसा कि ऊपर उल्लेख किया गया है, यहाँ भारत सरकार द्वारा जारी अनुसूची में शामिल 43 जनजाति समूह आबाद हैं, जिनमें जनंसख्या की दृष्टि से भील, गोंड, कोल,सहरिया,बैगा, कोरकू आदि प्रमुख हैं। आदिम जाति समूह के अंतर्गत बैगा, भारिया और सहरिया शामिल हैं। इन सभी जनजातियों की अपनी-अपनी बोलियाँ हैं। भील समूह की भीली, भिलाली, बारेली, पटलिया आदि बोलियाँ प्रमुख रूप से झाबुआ, अलीराजपुर, धार, खरगौन, बड़वानी, रतलाम, मंदसौर आदि जिलों में बोली जाती है। यह आर्य भाषा परिवार से संबंधित भाषा समूह है। इन बोलियों का मौखिक साहित्य अत्यंत समृद्ध है। गोंडी मध्य भारत की प्रमुख जनजातीय भाषा है। एक कालखंड में वर्तमान उत्तर प्रदेश की सीमा से लेकर मध्यप्रदेश, छत्तीसगढ़, उड़ीसा, तेलंगाना, महाराष्ट्र आदि राज्यों के विभिन्न क्षेत्रों में गोंडवाना साम्राज्य स्थापित था।उन क्षेत्रों में आज भी गोंडी के विभिन्न रूपों का प्रयोग होता है। मध्यप्रदेश में प्रमुख रूप से मंडला, डिण्डौरी, जबलपुर, बालाघाट, सिवनी, शहडोल, अनूपपुर, सीधी, रायसेन, सागर, होशंगाबाद, बैतूल, छिन्दवाड़ा आदि जिलों में गोंडी बोली जाती है। यह द्रविड़ भाषा-परिवार की भाषा है। मध्यप्रदेश में इसके दो रूप देखने को मिलते हैं। एक आधुनिक रूप, जिसे ‘मंडलाही’ कहा जाता है, इसमें आर्य बोलियों-जैसे छत्तीसगढ़ी, बुंदेली आदि के साथ हिन्दी-मराठी के शब्दों की प्रचुरता है और दूसरा मूल द्रविड़ियन रूप, जो ‘पारसी’ कहलाता है।

      कोरकू जनजाति की भाषा कोरकू कहलाती है। कोरकू जातिसूचक शब्द ‘कोरो’ (मनुष्य) शब्द में बहुवचन सूचक ‘कू’ प्रत्यय लगाने पर बना है। कोरकू समूह की दो उप बोलियाँ हैं, जो मवासी अथवा मोवासी और नहाली अथवा निहाली कहलाती हैं। यह आस्ट्रिक भाषा परिवार की बोली मानी जाती है, जो खंडवा, बुरहानपुर, हरदा, होशंगाबाद, बैतूल आदि जिलों के साथ ही महाराष्ट्र के सीमावर्ती क्षेत्रों में भी बोली जाती है। कोरकू आस्ट्रो-एशियाई भाषा-परिवार की मुण्डा शाखा की भाषा है। कोरकू समुदाय की बसाहट गोंड समुदाय के आसपास होती है।

   बैगानी प्रमुख रूप से डिण्डौरी, मंडला, बालाघाट, शहडोल, अनूपपुर के साथ ही छत्तीसगढ़ के सीमावर्ती क्षेत्रों में भी प्रचलित है। भरियाटी पातालकोट की भारिया जनजाति द्वारा बोली जाती है। इन सभी बोलियों का मौखिक साहित्य इनकी प्राचीनतम ज्ञान-परंपरा को रेखांकित करता है।

   मध्यप्रदेश में जनजातीय बोलियों की स्थिति यदि जनगणना संबंधी आँकड़ों के विश्लेषण के आधार पर देखी जाये तो यह पता चलता है कि इन भाषाओं के प्रयोक्ता जनसंख्या की तुलना में निरंतर कम होते जा रहे हैं। अल्प आबादी वाली जनजातियों द्वारा बहुसंख्यक समुदाय की बोलियों को संपर्क भाषा के रूप में व्यवहार में लाये जाने के कारण उनकी मातृभाषा विस्मृत होती जा रही है। इसके अलावा जनजातीय क्षेत्रों में शिक्षा का माध्यम हिन्दी अथवा अन्य भाषा होने के कारण भी विद्यार्थी अपनी मातृभाषा का प्रयोग प्रायः नहीं करते हैं। विभिन्न कारणों से शहरों के संपर्क में आने और आवश्यकता के अनुरूप हिन्दी अथवा अन्य भाषाओं के प्रयोग की  बाध्यता के कारण भी जनजातीय युवा अपनी मूल भाषा से दूर होते जा रहे हैं।

      निष्कर्ष रूप में जनजातीय भाषाओं की वर्तमान दशा को देखते हुए यही कहा जा सकता है कि अनुकूल माहौल बनाकर यदि इन्हें खुली हवा में साँस लेने का अवसर उपलब्ध नहीं कराया गया तो जल्दी ही इनका दम घुट जायेगा। इसलिये इनकी सही देखभाल घरों में ही हो सकती है। हर माँ को बच्चे की परवरिश अपनी भाषा में करनी होगी। स्कूल हो,या कार्यस्थल-कहीं भी किसी को अपनी भाषा बोलने से न रोका जाये।ये प्राचीन भाषाएँ बचेंगी तो इनके साथ करोड़ों वर्षों के अनुभव से अर्जित ज्ञान-संपदा भी बचेगी। संतोष की बात है कि वर्तमान मध्यप्रदेश सरकार जनजातीय संस्कृति और भाषाओं के संरक्षण को लेकर गंभीर है और इनके प्रोत्साहन के अनेक उपाय लगातार कर रही हैं।

पीएम नरेंद्र मोदी ने पंडित जवाहरलाल नेहरू को उनकी जयंती पर किया याद, ट्वीट कर दी श्रद्धांजलि

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नई दिल्ली
प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी भारत के प्रथम प्रधानमंत्री पंडित जवाहरलाल नेहरू को उनकी जयंती पर 14 नवंबर को श्रद्धांजलि दी है। पीएम नरेंद्र मोदी ने ट्वीट कर लिखा है, “पंडित जवाहरलाल नेहरू जी को उनकी जयंती पर श्रद्धांजलि।” इस साल भारत के पहले प्रधानमंत्री पंडित जवाहरलाल नेहरू की 132वीं जयंती है।पंडित जवाहरलाल नेहरू का जन्म 14 नवंबर, 1889 को इलाहाबाद (प्रयागराज) में हुआ था। जवाहरलाल नेहरू की जयंती को भारत में बाल दिवस के रूप में मनाया जाता है।
पंडित जवाहरलाल नेहरू, जिन्हें प्यार से चाचा नेहरू के नाम से जाना जाता है, उन्हें बच्चों से काफी प्यार था। भारत 1956 से पहले हर साल 20 नवंबर को बाल दिवस मनाता था क्योंकि संयुक्त राष्ट्र ने 1954 में इस दिन को सार्वभौमिक बाल दिवस के रूप में घोषित किया था। 1964 में नेहरू की मृत्यु के बाद, संसद में सर्वसम्मति से 14 नवंबर को उनकी जयंती के दिन को राष्ट्रीय बाल दिवस के रूप में घोषित करने का प्रस्ताव पारित किया गया था। उस वक्त से लेकर अब तक हर साल 14 नवंबर को भारत में बाल दिवस मनाया जाता है।

कांग्रेस ने भी पंडित नेहरू को श्रद्धांजलि अर्पित की है। नेहरू कांग्रेस पार्टी के कई बार राष्ट्रीय अध्यक्ष रह चुके हैं। कांग्रेस पार्टी ने अपने ट्विटर हैंडल पर पोस्ट किया, “हर शब्द, हर कृत्य, हर बलिदान, पंडित नेहरू जी ने सच्चे राष्ट्रवाद की मिसाल पेश की है। नेहरू ने हमारे देश की एकता के लिए, हमारे देश की विविधता के लिए, हमारे देश की समृद्धि के लिए एक अटूट समर्पण दिखाई है।’

15 अगस्त 1947 को भारत और पाकिस्तान दो अलग-अलग स्वतंत्र देश बनने के बाद नेहरू स्वतंत्र भारत के पहले प्रधानमंत्री बने। 1963 में उन्हें पहला हार्ट अटैक आया था और जनवरी 1964 में दूसरा और कुछ महीने बाद तीसरे हार्ट अटैक आया और उनकी मौत हो गई। उनकी बेटी इंदिरा गांधी 1966 से 1977 तक भारत की प्रधानमंत्री रहीं।

कल MP में PM के दौरे का ट्रैफिक प्लान जारी

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भोपाल
प्रदेश की राजधानी में 15 नवंबर को प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के एक दिवसीय दौरे के कारण भोपाल में ट्रैफिक व्यवस्था में आवश्कता अनुसार बदलाव किया गया है. भोपाल में आने जाने वाले सभी मार्गों में कुछ परिवर्तन किए गए हैं. जानिए आम जनों के लिए कौन से रास्ते प्रतिबंधित रहेंगे, जम्बूरी मैदान पर पहुंचने के लिये क्या रहेगी व्यवस्था, सिटी बसों के लिये भी रहेंगे अलग रूट, स्टेशन जाने वाले यात्रियों के लिये भी मार्ग परिवर्तित रहेगा.

15 नवम्बर को प्रधानमंत्री के भोपाल भ्रमण के दौरान ऐसे रहेगी यातायात व्यवस्था

A. जम्बूरी मैदान कार्यक्रम के लिए व्यवस्था
1. कार्यक्रम में शामिल होने वाले जन-सामान्य

  • कार्यक्रम में इन्दौर की तरफ से आने वाले समस्त प्रकार के बस वाहन खजूरी सड़क, बकानियाॅ डिपो होते हुए मुबारकपुर, लाम्बाखेड़ा, चैपड़ा कला, पटेल नगर बायपास, आंनद नगर से जम्बूरी मैदान कट प्वाइंट का उपयोग करते हुए बस पार्किंग स्थल में पार्क करेंगे.
  • राजगढ़ (ब्यावरा) की ओर से कार्यक्रम में भाग लेने वाले समस्त प्रकार के बस वाहन मुबारकपुर जोड़, लांबाखेड़ा जोड़, चैपड़ाकला जोड़, पटेल नगर बाइपास, आंनद नगर से जम्बूरी मैदान कट प्वाइंट का उपयोग करते हुए बस पार्किंग में पार्क करेंगे.
  • सागर/रायसेन की तरफ से आने वाले समस्त वाहन पटेल नगर चैराहा से आनंद नगर पहुंचेंगे एवं जम्बूरी मैदान में बायीं ओर मुड़कर बस पार्किंग में पार्क करेंगे.
  • होशंगाबाद रोड की ओर से आने वाले समस्त वाहन 11 मील से आउटर बाइपास होकर पटेल नगर चैराहे से बायीं ओर मुड़कर आनन्द नगर के आगे जाकर बायीं ओर मुड़कर जम्बूरी मैदान पर बस पार्किंग में पार्क करेंगे.

2. कार्यक्रम में शामिल होने वाले स्थानीय जन सामान्य, जीप/कार एवं दो पहिया वाहन
गोविन्दपुरा टर्निंग से महात्मा गांधी चौराहा की ओर आने वाले चार पहिया वाहन, महात्मा गांधी स्कूल पार्किंग एवं महात्मा गांधी तिराहा से होते हुए सेंट जेविंयर स्कूल के पीछे अपना वाहन पार्क करेंगे.

3. कार्यक्रम में आने वाले वीआईपी और पास धारक वाहन
गोविन्दपुरा टर्निंग से महात्मा गांधी चौराहा होते हुए अयप्पा मंदिर, गैस गोदाम होकर सेंट जेवियर स्कूल के सामने वीआईपी पार्किंग में वाहन पार्क कर सकेंगे.

4. कार्यक्रम में आने वाले मीडियाकर्मी
गोविन्दपुरा टर्निंग से महात्मा गांधी चौराहा से होते हुए अयप्पा मंदिर एवं गैस गोदाम के बीच मीडिया पार्किंग में वाहन पार्क कर सकेंगे.

5. यहां रहेगा पूर्णतः प्रतिबंध
कार्यक्रम के दौरान महात्मागांधी चैराहे से अवधपुरी चैक (जम्बूरी मैदान के सामने की रोड) तक वाहनों का आवागमन दिनांक-15 के सुबह 06ः00 बजे से शाम 06 बजे तक पूर्णतः प्रतिबंधित रहेगा.

6. भोपाल में यह मार्ग हुए परिवर्तित
अवधपुरी से बीकानेर मिष्ठान भंडार, सुरभि इन्कलेव, रिषिपुरम चौराहा, चर्च चैराहा, विजय मार्केट, श्रीकृष्ण मंदिर, बरखेड़ा, गुलाब उद्यान, मंस्जिद तिराहा, डीआरएम ऑफिस, हबीबगंज नाका अथवा हबीबगंज अण्डरब्रिज से 10 नम्बर मार्केट की ओर आवागमन कर सकेंगे. पिपलानी/अयोध्यानगर से आने वाले वाहन जेके रोड, आईटीआई तिराहा, प्रभात चौराहा मार्ग से आवागमन कर सकेंगे.

B. हबीबगंज रेलवे स्टेशन कार्यक्रम के लिए व्यवस्था
1. हबीबगंज स्टेशनन की ओर आने-जाने वाले वाहन

  • बागसेनिया थाने से मानसरोवर तिराहा तक आवागमन दिनांक 15 के सुबह 06ः00 बजे से शाम 06 बजे तक पूर्णतः प्रतिबंधित रहेगा.
  • यात्रीगण प्लेटफार्म नम्बर-01 की ओर से स्टेशन में प्रवेश नहीं कर सकेंगे. केवल प्लेटफॉर्म नम्बर-05 का उपयोग कर सकेंगे.
  • बोर्ड ऑफिस की ओर से जाने वाले वाहन गोविन्दपुरा टर्निंग, आईएसबीटी बस स्टैंड, सांची दुग्ध संघ, हबीबगंज स्टेशन प्लेटफार्म नम्बर-05 का उपयोग किया जा सकेगा.
  •  मिसरोद की ओर से आने वाले वाहन बागसेवनिया थाना तिराहा से अरविन्द विहार काॅलोनी मार्ग का उपयोग कर एम्स अस्पताल, आरआरएल तिराहा, हबीबगंज नाका होते हुए प्लेटफॉर्म नम्बर-05 की ओर आवागमन कर सकेंगे.

2. कार्यक्रम में आने वाले पासधारी वाहन
बोर्ड ऑफिस चौराहे की ओर से आने वाले वाहन प्रगति पेट्रोल पंप होते हुये मान सरोवर तिराहा का उपयोग कर हबीबगंज स्टेशन कार्यक्रम स्थल की ओर जा सकेंगे.
लिंक रोड नम्बर-02 एवं 03 की ओर से आने वाले वाहन 07 नम्बर चौराहा होकर मानसरोवर तिराहा से हबीबगंज स्टेशन कार्यक्रम स्थल की ओर जा सकेंगे.
मिसरोद की ओर से आने वाले वाहन बावड़िया कला ब्रिज से होते हुए 07 नम्बर चौराहा होकर मानसरोवर तिराहा से हबीबगंज स्टेशन कार्यक्रम स्थल की ओर जा सकेंगे.

3. इन मार्गों का हुआ परिवर्तन
होशंगाबाद की ओर से आने वाले वाहन मिसरोद, बावड़िया रोड ओवर ब्रिज से शाहपुरा, मनीषा मार्केट एवं कोलार रोड से अरेरा काॅलोनी, 12 नम्बर मार्केट, 10 नम्बर मार्केट की ओर आवागमन कर सकेंगे. बोर्ड ऑफिस चौराहे से प्रगति होकर हबीबगंज स्टेशन की ओर एवं 07 नम्बर स्टॉप से मानसरोवर हबीबगंज की ओर सामान्य वाहन के लिए मार्ग प्रतिबंधित रहेगा.

4. यात्री बसों का डायवर्जन

  • होशंगाबाद, जबलपुर, छिंदवाड़ा, बैतूल की ओर से आने वाली बसें बागसेवनिया थाना तिराहा से बागसेवनिया आईसीआईसीआई बैंक तिराहा, अरविन्द विहार काॅलोनी, एमरोल्ड सिटी मार्ग का उपयोग कर एम्स अस्पताल गेट नम्बर-3, साकेत नगर, आरआरएल तिराहा, हबीबगंज नाका होते हुए आईएसबीटी की ओर आवागमन कर सकेंगे. आईएसबीटी से आगे यात्री बसों का नादरा बस स्टैंड की ओर प्रवेश प्रतिबंधित रहेगा.
  • सागर, छतरपुर, दमोह की ओर से आने वाली यात्री बसें पटेल नगर बाइपास, चैपड़ाकला, भानपुर चैराहा, पीपुल्स माॅल, बेस्ट प्राइज, करोंद मंडी, जेपी तिराहा होते हुए नादरा बस स्टैण्ड अथवा इंदौर की ओर आवागमन कर सकेंगी.
  • इंदौर से भोपाल की ओर आने वाली बसें हलालपुर बस स्टैण्ड का उपयोग कर सकेंगी. इंदौर, उज्जैन की ओर से आने वाली यात्री बसों का हलालपुर बस स्टैण्ड से आगे लालघाटी की ओर प्रवेश प्रतिबंधित रहेगा.
  • गुना, राजगढ़, ब्यावरा की ओर से आने वाली यात्री बसें मुबारकपुर बाइपास से खजूरी सड़क, बैरागढ़ होकर हलालपुर बस स्टैण्ड की ओर आवागमन कर सकेंगी. इन बसों का प्रवेश हलालपुर बस स्टैण्ड से लालघाटी की ओर प्रतिबंधित रहेगा.